उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति पर सुनवाई, पुराने आंकड़े पेश करने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी………..

नैनीताल: उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों की दयनीय स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए पुराने आंकड़ों पर गहरी नाराजगी जताई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से शपथ पत्र में जमा किए गए आंकड़े साल 2024 के हैं, इसलिए सरकार जल्द से जल्द वर्तमान स्थिति से अदालत को अवगत कराएं. सुनवाई के दौरान सामने आया कि राज्य के करीब 2,500 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। जबकि, 270 स्कूलों में पेयजल तक की सुविधा नहीं है।

इसके अलावा याचिकाकर्ता को आरटीआई के माध्यम से जानकारी मिली है कि करीबन 250 स्कूल भवन इतने जर्जर हैं कि कभी भी गिर सकते हैं, लेकिन बजट जारी न होने से उनका जीर्णोद्धार का काम अटका हुआ है। जिस वजह से यह स्कूल नौनिहालों की जान पर खतरा बने हुए हैं।

क्या है मामला?दरअसल, ​यह मामला साल 2024 में पिथौरागढ़ निवासी डॉ. राजेश पांडे की ओर से दायर जनहित याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें पिथौरागढ़ समेत प्रदेशभर के स्कूलों में अध्यापकों की भारी कमी और खस्ताहाल भवनों की स्थिति को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने पूर्व में राज्य और केंद्र सरकार से ये भी पूछा था कि यदि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति संभव नहीं है, तो राज्य सरकार का अगला कदम क्या होगा और ऑनलाइन शिक्षा का लाभ बच्चों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।

चूंकि मामला लंबे समय से विचाराधीन था और सरकार की ओर से कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इसलिए देहरादून निवासी रवींद्र सिंह मेहरा ने नई याचिका दायर कर इसे दोबारा चुनौती दी। याचिका में न्यायालय से गुहार लगाई गई है कि विद्यालयों में अविलंब शिक्षकों की नियुक्ति की जाए और जर्जर भवनों की मरम्मत कराकर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित किया जाए।