उत्तराखंड में आदि कैलास अल्ट्रा मैराथन: हिमालय में 15000 फीट की ऊंचाई पर 1200 एथलीट, नशामुक्ति-पर्यटन और सीमा सुरक्षा का संदेश……….
पिथौरागढ़: जहां सांस लेना भी चुनौती है, वहां 1200 धावक दौड़ रहे हैं। चीन सीमा से सटे आदि कैलास में अल्ट्रा मैराथन के जरिए उत्तराखंड दुनिया को नशामुक्ति, पर्यटन और सामरिक मजबूती का संदेश दे रहा है।
आदि कैलास की अल्ट्रा मैराथन को केवल एक खेल आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि उच्च हिमालय में बदलते भारत की तस्वीर के रूप में देखना चाहिए।
यह आयोजन तीन प्रमुख संदेशों को एक साथ जोड़ता है मसलन युवाओं के लिए नशामुक्ति, सीमांत क्षेत्रों के लिए पर्यटन और आजीविका विस्तार, तथा अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारत का मजबूत होता बुनियादी ढांचा।
2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था दौरा
आज से मात्र सात वर्ष पूर्व चीन और नेपाल सीमा से लगे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील का यह भुूभाग अनछुआ था। आदि कैलास कुछ चुनिंदा और स्थनीय लोग ही पहुंच पाते थे 2020 में लिपुलेख तक सड़क बनने के बाद इस क्षेत्र की स्थिति बदलने लगी और जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी वह वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद वह हुआ।
सीमांत जिला निवासी भी आदि कैलास का नाम भर जानते थे और वहीं आदि कैलास आज देश ही नहीं अपितु विश्व में जाना जा रहा है। कहा जाता हे कि गंगा गंगोत्री से बहती है शिव की धरा और चोटी से नशामुक्ति का संदेश पूरे देश में जाएगा।
माइनस 7 डिग्री में हौसला और जीवन के प्रति अनुशासन से फिटनेस का संदेश
15 हजार फीट की ऊंचाई ,चारों तरफ से बहने वाली बर्फीली हवा, अक्टूबर के समापन सप्ताह की सुबह की कल्पना ही लोगों को डारा देती है। परंतु आदि कैलास में 65 ,64 वर्ष के बुजुर्ग हाफ पैट ओर गंजी में दौड़ लगाते दिखे। दौड़ भी सौ दो साै मीटर नहीं बल्कि 72 किमी। ज्योलिंगकांग में सुबह साढ़े पांच बजे तापमान माइनस 7 डिग्री था। ऑक्सीजन आधी।
ऐसे में 64 साल के पूर्भु छेरंग, 65 साल के महेंद्र सिंह जैसे धावक जब दौड़ते हैं तो यह सिर्फ दौड़ नहीं, जीवन के प्रति अनुशासन का संदेश है। देश के 26 राज्यों के1100 धावकों को नशामुक्ति की शपथ दिलाना और ”नशे को ना, जिंदगी को हां” का नारा, इसी धरती से पूरे देश में जाता है। यह संदेश देता है कि शारीरिक रुप से फिट रहना जरुरी है। स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ी नेमत है।य ह दौड़ देश की युवा पीढ़ी को संदेश देती नजर आयी।
आदि कैलास अल्ट्रा मैराथन 2.0: 15000 फीट ऊंचाई… -7 डिग्री तापमान, 1200 धावकों संग दौड़े यूपी के 65 साल के महिपाल
15 हजार फीट पर पर्यटन की नई संभावनाएं
72 किमी वर्ग में 109 धावकों की 14 घंटे की दौड़ ने साबित किया कि आदि कैलास अब सिर्फ तीर्थ नहीं, एडवेंचर टूरिज्म का वैश्विक केंद्र बन सकता है। खाने-पीने के स्टॉल, मेडिकल कैंप और स्थानीय लोगों की भागीदारी से सीमांत गांवों में होमस्टे और रोजगार की नई राह खुली है।एक तरफ जहां आस्था का संभल था तो दूसरी तरफ जीवटता ने साबित कर दिया कि जीवन जीने के लिए हिमालय जैसी ही अडिगता चाहिए।
चीन सीमा पर भारत की मजबूत मौजूदगी
यह दौड़ चीन सीमा से कुछ ही किलोमीटर दूर हुई। यहां 1200 लोगों का जुटना, आईटीबीपी और प्रशासन का बेहतर तालमेल और सड़क, नेटवर्क, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का मौजूद होना बताता है कि सीमांत पर भारत का बुनियादी ढांचा कितना मजबूत हुआ है।
यह सॉफ्ट पावर के जरिए सीमा सुरक्षा का प्रदर्शन है।आज से कुछ वर्षों पूर्व तक सड़क से यहां तक पहुंचने के लिए पैदल छह से सात दिन का समय लगता था। दुर्गम मार्ग के चलते यहां जाने वाले थोड़े बहुत लोगो में आधे से अधिक लोग भय से वापस लौट जाते थे । वर्तमान में सीमा पर सड़क यहां पर एक साथ दौड़ने के लिए एक हजार से अधिक धावकों का जुटना सुरक्षित भारत को दर्शा रहा है।
पहली मैराथन संदेश रही तो दूसरी ने दे दिया विस्तार
वर्ष 2023 के अक्टूबर माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदि कैलास दौरे के बाद इस क्षेत्र को नई पहचान मिली। इस पहचान के चलते ही यहां पर अल्ट्रा मैराथन का आयोजन किया गया।आयोजन की सफलता को लेकर संदेह भी था ।मौसम सबसे बड़ा बाधक रहता है।
वर्ष 2025 के बाद इस बार दूसरी अल्ट्रा मैराथन है और पहली से बड़ी है। पहली बार संदेश दिया गया, दूसरी बार उस संदेश को विस्तार दिया गया। 13 राज्यों से 1200 धावकों का आना इसी निरंतरता का प्रमाण है।
चुनौतियों को दरकिनार कर 15 हजार फीट पर दौड़े धावक
मैदान के अलावा पहाड़ के ही औसत ऊचाई वाले क्षेत्र की दौड़ और उच्च हिमालय की दौड़ में जमीन-आसमान का अंतर है।उच्च हिमालय में भी साढ़े दस हजार से पंद्रह हजार फीट की ऊंचाई की दौड़ तमाम तरह की चुनौतियों देती है । इन चुनौतियों को धावकों ने स्वीकार कर सफलता पाई।
यह एक अति सकारात्मक कदम है। यहां हर कदम पर फेफड़े ज्यादा ऑक्सीजन मांगते हैं, दिल की धड़कन बढ़ती है, हाई एल्टीट्यूड सिकनेस का खतरा रहता है। माइनस तापमान में मसल्स जाम होने का डर। इसलिए ज्योलिंगकांग की दौड़ शारीरिक से ज्यादा मानसिक दृढ़ता की परीक्षा है।
पहली मैराथन प्रयोग तो दूसरी अनुभव, आयोजन कैलेंडर इंवेंट बनने की तरफ
आदि कैलास में पहली मैराथन वर्ष 2025 में हुई। यह मैराथन आयोजकों की दृष्टि में प्रयोग थी।उसकी सफलता के बाद दूसरी मैराथन का आयोजन इस बार किया गया। यह अनुभव की प्रतीक रही। जिस तरह की तैयारियां, व्यवस्थाएं व प्रबंधन रहा उससे प्रतीत होता है कि सीमा पर जीवन, स्वास्थ्य सुरक्षित है।
युवा तो युवा परंतु बुर्जुगों ने जिस तरह चुनौतियों का सामना किया यह साबित करता है कि देश में अब आत्मबल के साथ मानसिक और शारीरिक क्षमता बढ़ चुकी है। इस बार 72 किमी जैसा चुनौतीपूर्ण वर्ग जोड़ा गया, प्रतिभागी दोगुने से ज्यादा हुए, व्यवस्थाएं ज्यादा पेशेवर हुईं और नशामुक्ति थीम को केंद्र में रखा गया। अब यह आयोजन कैलेंडर इवेंट बनने की ओर अग्रसर है।


