उत्तराखंड में हॉफ रही नैनीझील की सांसें, 19 साल पुराना एरियेशन सिस्टम जर्जर, ऑक्सीजन संकट गहराया…….
नैनीताल: साल 2007 में झील को कृत्रिम ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के लिए एरियेशन प्लांट लगाया गया था। उस समय झील में गिरते सीवर, नालों की गंदगी के कारण पानी में डिजाल्व ऑक्सीजन का स्तर तेजी से कम हो गया था। इसी संकट से निपटने के लिए झील की तलहटी तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाला आधुनिक एरियेशन सिस्टम स्थापित किया गया था. मगर, अब ये सिस्टम जर्जर हो चुका है।
उत्तराखंड की सरोवर नगरी कही जाने वाली नैनीताल की पहचान सिर्फ पहाड़ों और पर्यटन से नहीं, बल्कि शहर की धड़कन मानी जाने वाली नैनीझील से भी है. मगर, आज यही झील खुद सांसों के संकट से जूझ रही है. कभी शहर की लाइफलाइन कही जाने वाली नैनीझील में अब ऑक्सीजन का स्तर लगातार घटता जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह बना है 19 साल पुराना एरियेशन सिस्टम, जो अब लगभग जवाब दे चुका है।
साल 2007 में झील को कृत्रिम ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के लिए एरियेशन प्लांट लगाया गया था। उस समय झील में गिरते सीवर, नालों की गंदगी और अनियोजित निर्माण कार्यों के कारण पानी में डिजाल्व ऑक्सीजन का स्तर तेजी से कम हो गया था। हालात इतने खराब हो गए थे कि बड़ी संख्या में मछलियों की मौत होने लगी और झील का जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने लगा। इसी संकट से निपटने के लिए झील की तलहटी तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाला आधुनिक एरियेशन सिस्टम स्थापित किया गया था।
2012 में समाप्त हो गई थी वारंटी
अब करीब दो दशक बाद यही सिस्टम खुद मरम्मत और बदलाव की मांग कर रहा है. जानकारी के अनुसार, प्लांट की पांच साल की वारंटी वर्ष 2012 में ही समाप्त हो गई थी, लेकिन उसके बाद से उपकरणों के रखरखाव को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई। स्थिति यह है कि झील के भीतर लगी अधिकांश एरियेशन ट्यूब फट चुकी हैं, जबकि कई डिस्क पूरी तरह जाम हो चुकी हैं. इसके कारण तलहटी तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही है।
कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर आनंद कोरंगा के मुताबिक झील किनारे दो एरियेशन स्टेशन स्थापित हैं, जहां से ट्यूबों के माध्यम से झील की तलहटी में लगी 30 एरियेशन डिस्क तक ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है. प्लांट की मशीन एक बार में करीब 500 गेज एयर बनाकर सप्लाई करती है. फिलहाल झील की सतह पर डिजाल्व ऑक्सीजन का स्तर लगभग 7 मिलीग्राम प्रति लीटर है, लेकिन तलहटी में यह घटकर 3 से 4 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गया है, जो चिंता का विषय माना जा रहा है।
नहीं हो पाया बजट स्वीकृत
उन्होंने बताया कि प्लांट के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरण और एरियेशन डिस्क वर्ष 2007 में अमेरिका से मंगाए गए थे। वारंटी समाप्त होने के बाद वर्ष 2018 से लगातार जिला विकास प्राधिकरण को पत्र लिखकर उपकरण बदलने की मांग की जा रही है. इसी को देखते हुए जिला विकास प्राधिकरण ने करीब 5.78 करोड़ रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा था, ताकि नई ट्यूब और डिस्क लगाई जा सकें, लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद बजट स्वीकृत नहीं हो पाया है. इस पूरे मामले ने झील संरक्षण को लेकर सरकारी दावों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ओर नैनीताल को पर्यटन के लिहाज से विकसित करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर शहर की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर बुनियादी मरम्मत के इंतजार में है।
प्राधिकरण अपने फंड से करेगा मरम्मत
इस पूरे मामले पर कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने माना कि वर्तमान एरियेशन सिस्टम अपनी उम्र पूरी कर चुका है. उन्होंने कहा कि अब नए तरीके से इसकी डीपीआर तैयार की जाएगी और पाइपों की मरम्मत के लिए करीब 5 करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट शासन से मांगा गया है। यदि शासन से बजट स्वीकृत नहीं होता है तो प्राधिकरण अपने फंड से मरम्मत कार्य कराने का प्रयास करेगा।
पर्यावरणविदों और स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि समय रहते एरियेशन सिस्टम को दुरुस्त नहीं किया गया तो नैनीझील में ऑक्सीजन का स्तर और गिर सकता है, जिससे जलीय जीवों के साथ-साथ पूरी पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ सकता है। पर्यटन के लिए मशहूर यह झील अब संरक्षण और संवेदनशील प्रबंधन की मांग कर रही है।


