‘उत्तराखंड में पर्यटकों की मौज के लिए उजड़ रहे हमारे आशियाने’, देहरादून एलिवेटेड रोड के विरोध में सड़क पर उतरे 300 परिवार……….

देहरादून: राजधानी देहरादून में विकास की तेज रफ्तार और बाहरी पर्यटकों की राह सुगम करने की कवायद अब स्थानीय बाशिंदों के लिए आशियाने उजड़ने का दर्द बन गई है। लगभग 2500 करोड़ रुपये के बजट से बनने वाले 13 किलोमीटर लंबे आशारोड़ी-मोहकमपुर एलिवेटेड रोड के अलाइनमेंट ने करीब 300 परिवारों के सिर से छत छिनने का खतरा पैदा कर दिया है। अपनी जीवन भर की पूंजी और बुजुर्गों की यादों को बचाने के लिए अब स्थानीय नागरिक खुले आसमान के नीचे धरने पर उतर आए हैं।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बढ़ती जनसंख्या और यातायात को ठीक करने के लिए आशारोड़ी-मोहकमपुर फ्लाईओवर बनना है। ऐसे में यहां के स्थानीय लोगों ने कहा कि हमारी बचपन की यादें और बुजुर्गों की यादें इससे जुड़ी हुई हैं। कई लोगों की जीवनभर की पूंजी लगी हुई है, लेकिन पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां के अपने स्थानीय लोगों के ही आशियाने तोड़े जा रहे हैं। उनका कहना है कि गजट के अनुसार सॉलिटेयर होटल के बाद आशारोड़ी तक पुराने हाईवे को चौड़ा करने का प्रावधान है। लगभग 13 किलोमीटर लंबे इस एलिवेटेड रोड को बनाने में अनुमानित बजट 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षी परियोजना के कारण स्थानीय लोगों के आशियाने टूटने की नौबत आ गई है।

300 मकान जद में, बेघर होने के डर से अनिश्चितकालीन धरना
पर्यटकों के लिए बनाए जा रहे इस रोड की जद में लगभग 300 मकान आ रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों के बचपन के अरमान और बुजुर्गों की यादें उजड़ती नजर आ रही हैं। ‘मोहकमपुर आशारोड़ी एलिवेटेड रोड संघर्ष समिति’ के बैनर तले प्रभावित लोग खुले आसमान के नीचे अपने आशियानों को बचाने के लिए अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं।

50 साल पुराने मकान में रहने वाली बुजुर्ग महिला कमलेश का कहना है कि उन्होंने और उनके पति ने एक-एक पैसा जोड़कर और खुद गड्ढे खोदकर यह घर बनाया था। वहीं नेहा पंडित ने बताया कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से एक साल पहले ही मकान बनाया था, जिसका काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। मध्यम वर्ग के लिए घर बनाना एक सपने जैसा होता है और यह परियोजना उन्हें पूरी तरह बेघर कर देगी।

डीपीआर में बदलाव और लाल निशान लगने से आक्रोश
रिटायरमेंट के पैसे से 20 साल पहले घर बनाने वाले टीएस नेगी का कहना है कि उन्हें इस उम्र में बच्चों की छत बचाने के लिए सड़क पर बैठना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि पहले यह एलिवेटेड रोड नेशनल हाईवे से बनाया जाना था, लेकिन बाद में डीपीआर (DPR) में बदलाव करके इसे बस्ती की तरफ मोड़ दिया गया। स्थानीय लोगों को इस बदलाव की जानकारी तब मिली जब कुछ लोग उनके घरों पर लाल निशान लगाने पहुंचे। संघर्ष समिति के अनुसार, गजट में सॉलिटेयर होटल से आशारोड़ी तक पुराने हाईवे को ही चौड़ा करने का प्रावधान था।

दिहाड़ी मजदूरों की लाचारी और मुआवजे पर सवाल
टीएस नेगी का कहना है कि इस परियोजना का असर केवल उन्हीं लोगों पर नहीं पड़ेगा जिनके घर सीधे इसकी जद में हैं, बल्कि आसपास के मकानों में रहने वाले परिवार भी इससे प्रभावित होंगे। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने बताया कि कई प्रभावित दिहाड़ी-मजदूर ऐसे हैं जो प्रदर्शन में भी शामिल नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि काम पर न जाने से उनका चूल्हा नहीं जलेगा। बढ़ती महंगाई के दौर में सरकार की तरफ से मिलने वाले मुआवजे से दोबारा घर बना पाना लगभग असंभव है। बाहरी पर्यटकों के लिए अपनों की छत उजाड़ने के इस फैसले से स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।

NHAI का पक्ष और 24 अक्टूबर को प्रशासनिक बैठक
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अधिकारी सौरभ सिंह के अनुसार, प्रिंस चौक से जोगीवाला तक ट्रैफिक का दबाव काफी अधिक है। पुराने अलाइनमेंट या मौजूदा हाईवे को चौड़ा करने पर दोनों तरफ घनी आबादी और बड़ी इमारतें होने के कारण ज्यादा नुकसान हो रहा था, इसलिए रेलवे लाइन के साथ उपलब्ध जमीन पर नए अलाइनमेंट का विकल्प चुना गया. यह रोड रेलवे की जमीन छोड़कर मोहकमपुर बस्ती, कंपनी बाग, जोगीवाला फाटक, फ्रेंड्स कॉलोनी और रिस्पना नदी से होते हुए अजाबपुर फ्लाईओवर से जुड़ेगा। इस विवाद को सुलझाने के लिए देहरादून जिला प्रशासन ने 24 अक्टूबर 2026 को कलेक्ट्रेट में बैठक बुलाई है, जिसमें प्रभावित लोगों और NHAI दोनों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा।