उत्तराखंड की राजधानी के एनआईपीवीडी में दृष्टिबाधित लोगों को 3 महीने की मुफ्त ट्रेनिंग……..
देहरादून: आंखों की रोशनी चले जाने के बाद इंसान को बैलेंस बनकर चलने में भी दिक्कत होती है, यहां अब कुछ सिखाया जाता है और केंद्र सरकार की ओर से यह सब बिल्कुल फ्री है. किसी भी उम्र के दृष्टि बाधित लोग एडमिशन ले सकते हैं, 3 महीने की ट्रेनिंग होती है, यहां रहने का खर्च भी सरकार ही वहन करती है. संस्थान के कार्यवाहक निदेशक डॉ. विनोद कुमार केन बताते हैं कि पहले संस्थान में आर्मी जवानों को रोशनी जाने पर ट्रेनिंग दी जाती थी लेकिन अब सामान्य लोगों को भी दृष्टिबाधित हो जाने पर ट्रेनिंग दी जाती है. उन्होंने बताया कि यहां 3 महीने का एडजस्टमेंट कोर्स होता है।
इंसान की जिंदगी में कई हाथ से ऐसे होते हैं कि उसे हमेशा के लिए दुखी करके चले जाते हैं। एक्सीडेंट में लोगों के हाथ पर ही नहीं बल्कि कुछ चोटें ऐसी होती हैं. जिनमें आंखों की रोशनी चली जाती है, इंसान को बहुत डिमोटिवेशन होता है लेकिन आगे जिंदगी तो जीनी ही पड़ती है. पूरी दुनिया अंधेरी हो जाने के बाद बिना आंखों के कैसे दैनिक जीवन के काम किए जाएं और कैसे आगे बढ़ा जाए इसके लिए देहरादून के एनआईपीवीडी में ट्रेनिंग दी जाती है और कई तरह की कोर्स करवाए जाते हैं। इनमें कंप्यूटर कोर्स भी शामिल है, इंसान जब दृष्टिबाधित हो जाता है तब उसके लिए चलना भी मुश्किल हो जाता है लेकिन यहां ट्रेनिंग दी जाती है कि किस तरह से चलना है. बैठना है और काम करना है।
दृष्टि बाधित लोग ले सकते हैं एडमिशन।
आंखों की रोशनी चले जाने के बाद इंसान को बैलेंस बनकर चलने में भी दिक्कत होती है, यहां अब कुछ सिखाया जाता है और केंद्र सरकार की ओर से यह सब बिल्कुल फ्री है. किसी भी उम्र के दृष्टि बाधित लोग एडमिशन ले सकते हैं, 3 महीने की ट्रेनिंग होती है, यहां रहने का खर्च भी सरकार ही वहन करती है।
संस्थान के कार्यवाहक निदेशक डॉ. विनोद कुमार केन बताते हैं कि पहले संस्थान में आर्मी जवानों को रोशनी जाने पर ट्रेनिंग दी जाती थी लेकिन अब सामान्य लोगों को भी दृष्टिबाधित हो जाने पर ट्रेनिंग दी जाती है। उन्होंने बताया कि यहां 3 महीने का एडजस्टमेंट कोर्स होता है. यहां अभ्यर्थियों के रहने, खाने और प्रशिक्षण का पूरा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है, जिससे किसी भी आर्थिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति यहाँ प्रशिक्षण लेता है।
बॉडी बैलेंस और मोबिलिटी की विशेष ट्रेनिंग।
अचानक विजन लॉस होने पर व्यक्ति के लिए शरीर का संतुलन बनाना और अकेले चलना भी एक चुनौती बन जाता है. मोबिलिटी इंस्ट्रक्टर देवी लाल के अनुसार, ट्रेनिंग के दौरान सबसे पहले ‘ओरिएंटेशन एंड मोबिलिटी’ की शिक्षा दी जाती है. इसके तहत मेंटल मैप तैयार करना और अन्य शेष इंद्रियों (जैसे सुनने और छूने की क्षमता) को मजबूत करना सिखाया जाता है. इससे व्यक्ति बिना किसी सहायता के सही संतुलन बनाकर चलना और रोजमर्रा के काम करना सीख जाता है।
ब्रेल लिपि और आधुनिक टेक्नोलॉजी का उपयोग।
देवी लाल बताते हैं कि रोशनी जाने के बाद पढ़ाई-लिखाई और संचार बनाए रखने के लिए अभ्यर्थियों को ब्रेल लिपि सिखाई जाती है., इसके साथ ही, आज के डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए उन्हें स्मार्ट डिवाइसेस चलाने के लिए तैयार किया जाता है। संस्थान में मोबाइल और कंप्यूटर ऑपरेटिंग के साथ-साथ मुद्रा की पहचान कराने वाले एसबीआई के विशेष ऐप्स और ‘सीइंग एआई’ व ‘बी माय आइज’ जैसे मददगार असिस्टेंट ऐप्स का उपयोग करना भी सिखाया जाता है।
आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन का जरिया।
एनआईपीवीडी में दी जाने वाली ट्रेनिंग का मुख्य उद्देश्य दृष्टिबाधित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। भोजन करने, बैठने और चलने जैसे बुनियादी कामों से लेकर कंप्यूटर कोर्स तक की ट्रेनिंग पाकर व्यक्ति मानसिक अवसाद से बाहर निकलता है। हादसे के बाद थम जाने वाली जिंदगी को यहाँ से एक नई दिशा मिलती है, जिससे व्यक्ति बिना किसी पर बोझ बने आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकता है।


