आइये जानते है वेद दीपक कुमार से “आयुर्वेद के अनुसार रोजाना कितना पानी पीना चाहिए”…..

हरिद्वार: आयुर्वेद में जल का महत्व अत्यधिक है क्योंकि जल शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। जल शरीर को ठंडक प्रदान करता है, पाचन को सहायता करता है, और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। जल का सेवन उचित मात्रा में करने से वात, पित्त, और कफ दोषों को संतुलित किया जा सकता है।

*आयुर्वेद के अनुसार रोजाना पानी पीने की मात्रा:-

1. व्यक्ति की आयु, वजन और जलवायु के अनुसार:-
प्रत्येक व्यक्ति की जल की आवश्यकता भिन्न होती है। आयुर्वेद में कहा गया है कि शरीर के प्रकार (वात, पित्त, कफ) के अनुसार पानी की आवश्यकता भिन्न हो सकती है।

सामान्यतः वयस्कों के लिए 8-10 गिलास (लगभग 2-2.5 लीटर) पानी पीना सामान्य सलाह है।

गर्म जलवायु में, विशेष रूप से गर्मियों में, पानी की आवश्यकता बढ़ सकती है।

*2. जल का गुणवत्ता:-
जल की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। ताजे, स्वच्छ, और शुद्ध जल का सेवन करना चाहिए। आयुर्वेद में इसे ‘स्निग्ध जल’ कहा जाता है, जिसका मतलब है कि पानी में स्वाभाविक रूप से स्निग्धता होती है।

किचल और दूषित जल का सेवन करने से पित्त और कफ दोषों में असंतुलन आ सकता है।

*3. जल का सेवन समय:-
आयुर्वेद के अनुसार, भोजन के बीच और तुरंत बाद बहुत अधिक पानी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन अग्नि (जठराग्नि) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भोजन से 30 मिनट पहले और 1-2 घंटे बाद पानी पीने की सलाह दी जाती है। यह पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है।

सुबह खाली पेट एक गिलास पानी पीना शरीर को सक्रिय करने और पाचन तंत्र को उत्तेजित करने के लिए फायदेमंद होता है।

*4. जल का प्रकार:-
कफ-प्रधान व्यक्तियों के लिए हल्के और गर्म जल का सेवन करना चाहिए।

पित्त-प्रधान व्यक्तियों को ठंडा पानी पीने की सलाह दी जाती है।

वात-प्रधान व्यक्तियों को सामान्य रूप से पानी का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

*5. जल का सेवन संतुलन में:-
पर्याप्त पानी पीने से रक्त परिसंचरण में सुधार होता है, विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है, और त्वचा की रंगत को सुधारा जाता है।

जल का अत्यधिक सेवन भी वात दोष को बढ़ा सकता है, जबकि कम सेवन पित्त और कफ दोष को असंतुलित कर सकता है।

*आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से जल का महत्व:-
जल पित्त, कफ, और वात दोषों को संतुलित करने में सहायक होता है।

पर्याप्त पानी पीने से पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है।

आयुर्वेद में पानी का सेवन व्यक्ति के शरीर के प्रकार (वात, पित्त, कफ) के अनुसार अनुकूलित किया जाता है।