उत्तराखंड में यहाँ हाथों से बुने इन कालीनों का नहीं है कोई जवाब, कीमत 5 से 25 हजार तक, खासियतें भी हैं बेमिसाल……..

बागेश्वर: उत्तराखंड की बर्फीली वादियों में तैयार होने वाले ‘दन’ (पारंपरिक कालीन) सिर्फ फर्श की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि ये सदियों पुरानी परंपरा की गर्माहट भी समेटे हुए हैं. बागेश्वर और पिथौरागढ़ के भोटिया समुदाय द्वारा हाथों से बुने गए ये कालीन इतने मजबूत होते हैं कि पीढ़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन इनकी चमक कम नहीं होती. जानिए 5 हजार से शुरू होकर 25 हजार तक बिकने वाले इन कालीनों की मेकिंग और इनके पीछे की कड़ी मेहनत की पूरी।

उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी समृद्ध संस्कृति और हस्तशिल्प के लिए भी जाना जाता है। यहां भेड़ की ऊन से तैयार किए जाने वाले पारंपरिक ‘दन’ और हाथ से बुने कालीन आज भी दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। आज के मशीनी दौर में भी यह कला पूरी तरह हाथों से की जाती है, जो इसे बेहद खास और कीमती बनाती है. राज्य के ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली और उत्तरकाशी में रहने वाला भोटिया (शौका) समुदाय पीढ़ियों से इस प्राचीन परंपरा को जिंदा रखे हुए है।

क्या होता है ‘दन’ और क्यों है यह इतना खास?
‘दन’ दरअसल एक मोटा, हाथ से बुना हुआ कालीन होता है. इसे पहाड़ के ठंडे इलाकों में फर्श पर बिछाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी गर्माहट और टिकाऊपन है. स्थानीय कारीगर बताते हैं कि अगर एक अच्छी क्वालिटी का दन लिया जाए, तो वह कई पीढ़ियों तक खराब नहीं होता। यही वजह है कि बाजार में इसकी जबरदस्त डिमांड है। इसकी कीमत 5 हजार रुपये से शुरू होती है और डिजाइन की बारीकी व साइज के हिसाब से 25 हजार रुपये या उससे भी ऊपर तक जाती है।

भेड़ की ऊन से कालीन बनने तक का पूरा सफर
इन कालीनों को बनाने का तरीका आज भी पूरी तरह पारंपरिक है। सबसे पहले स्थानीय भेड़ों से ऊन हासिल की जाती है. पुराने समय में ऊन को साफ करने के लिए ‘पांगर’ (हॉर्स चेस्टनट) के फल का इस्तेमाल किया जाता था, जो एक नेचुरल साबुन का काम करता था।

कताई और बुनाई: साफ ऊन को कातकर धागा बनाया जाता है. इसके बाद लकड़ी के खड़े करघों पर बुनाई शुरू होती है।
मजबूत बनावट: कालीन के आधार (बेस) के लिए सूती धागे और बुनाई के लिए शुद्ध ऊनी धागे का इस्तेमाल होता है, जिससे यह बहुत मजबूत बनता है।

डिजाइनों में दिखती है तिब्बती और पहाड़ी संस्कृति की झलक
इन कालीनों पर बने डिजाइन किसी कलाकार की पेंटिंग जैसे लगते हैं। इनमें ज्यामितीय आकृतियां, सुंदर फूल-पत्तियां और तिब्बती संस्कृति से प्रेरित ‘ड्रैगन’ के चित्र प्रमुखता से बनाए जाते हैं। धागों को रंगने के लिए पेड़ों की छाल, जड़ी-बूटियों और जंगली फलों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं, सफेद और काली ऊन को आपस में मिलाकर स्लेटी (ग्रे) रंग के अलग-अलग शेड्स तैयार किए जाते हैं, जो देखने में बहुत आकर्षक लगते हैं।

सिर्फ व्यापार नहीं, यह है सांस्कृतिक पहचान
दन के अलावा छोटे साइज के कालीन भी बनाए जाते हैं जिन्हें ‘आसन’ कहा जाता है. इनका उपयोग पूजा-पाठ, ध्यान लगाने या सोफे पर बैठने के लिए होता है। जानकारों का मानना है कि यह शिल्प केवल पैसे कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह भोटिया समुदाय के गौरवशाली इतिहास और उनके घुमक्कड़ जीवन की पहचान है। आज के समय में सरकार और कई संस्थाएं इस कला को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए काम कर रही हैं, ताकि पहाड़ की यह अनमोल विरासत लुप्त न हो जाए।